बापांचि शाळा मेरे लिए एक नया दौर साबित हुआ

बापांचि शाळा मेरे लिए एक नया दौर साबित हुआ. मुझे लग रहा था के जेण्डर के बारे में मै सब कुछ जानता हूं, अब और क्या जानना बाकि है ? लेकिन हर दिन मुझे नई जानकारि मिलते रहि, दिमाग खुलते गया और तिन दिनों के बाद पुरा असर और दमदार  गहरा रहा.बात कुछ यूं हुई के नाकि नऊ बच्चोंके साथ कुछ नोक झोंक हुई और मै गुस्सेमे बात छोड कर चलने लगा. बाप और पिता होनेके नाते मै सबका न्याय करने वाला और दण्ड देनेवाला. मेरा न्याय कौन करेगा बिलकूल यहि बात दुसरे दिन कि कर्यशाला में हुई थि. मुझे लगातार खुदको परखना बदलना पडा, नया रास्ता ढूंडना पडा.उस नये रास्तेके सुराग मुझे खेड शिवापूर कि चर्चामें मिले.

 एक तरफ मै सामाजिक अभियान कि बात कर रहा था और दुसरि तरफ मै अपना काम अकेले में करनेकि नाकाम कोशिश करा रहा था.मसलन मुझे लगातार आपसे जोडकर लेनदेन करनि पडेगि. जो मुझे पहला पाठ दिया था, जेण्डर एक लगातार चलनेवालि प्रक्रिया है, ऊसेहि भुलकर मै कैसे आगे बढ सकता हूं.मैने जो नोटस् लिए वह काम आ रहे है. अगलि बार ऊनमें कुछ और जोडना चाहूंगा. नाकि नऊ प्रयोगमें नइ दृश्टि मिलि है.
 मै पहलि बार आपको हिन्दि में लिख रहा हूं, आशा है आप समझ रहे हो. आपके जवाब का इन्तजार है. शुभकामनाओं सहित,
ऱवी केसकर
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